अभी-अभी माध्यमिक शिक्षा मण्डल, छत्तीसगढ़ के
द्वारा कक्षा-10वीं तथा 12वीं का वार्षिक परीक्षा परिणाम घोषित किया गया। परीक्षा
परिणाम हम सबने देखा उम्मीद से कहीं कम है। जिसके कारण छत्तीसगढ़ के तमाम सर्वोच्च
पदासिन विभागीय अधिकारीयों से लेकर शिक्षाविद्, शिक्षकगण, पालक, तथा स्वंय बालक सब
सोचने पर मजबूर हो गये है। हो भी क्यों न कुछ स्कूल का परीक्षा परिणाम शून्य जो है।
अधिकांश स्कूल का परीक्षा परिणाम बमुश्किल 50 प्रतिशत का आंकड़ा छु पाया है। कुल
मिलाकर कह सकते है कि, वर्तमान परीक्षा परिणाम गत वर्षों की तुलना में संतोष जनक
मात्र ही है ।
केवल ग्रमीण
इलाकों के स्कूलों का ये हाल होता तो शायद हम शिक्षक या स्कूल के संसाधनों में कमी
का रोना रो कर अपने आपको तस्लली दे पाते। परंतु शहरी क्षेत्रों के स्कूलों का भी जहां
उच्च गुण्वत्तायुक्त शिक्षकों का भरमार, पर्याप्त सुविधाएँ, तमाम आला अधिकारीयों
की निगरानी के बावजूद परिणाम निराशाजनक हो तो सच में कारणों के बारे में सोचना ही
चाहिए।
मैने भी इस विषय पर गंभीरता से विचार किया। आखिर सवाल हमारे
बच्चों के भविष्य का जो है। मुझे कुछ प्रमुख कारण नजर आया। शायद आप भी इनसे सहमत
होंगे।
अनुपस्थिति - मेरी नजर में बच्चों का अनुत्तीर्ण होने का सबसे बड़ा प्रमुख कारण विद्यालय
में अनियमित उपस्थिति है। हमारे छत्तीसगढ़ के अधिकांश विद्यालयों में 10 से 15
प्रतिशत बच्चों की उपस्थिति नियमित नही होने के कारण पढ़ाई में बच्चें पिछड़ते
जाते है। कक्षा व गृह कार्य छुटते जाते है । यह भी नही है कि, वे बच्चे अपनी
अनुपस्थिति के दिनों की पढ़ाई की भरपाई अपने घर पर कर लेते है। इन अनियमित बच्चों
के कारण बाकि बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है तथा अनुसाशित बच्चों की संख्या
बढ़ने लगती है । महिनों में कभी कभी आने वाले बच्चों की संख्या भी काफी होती है ।
कुछ बच्चे तो सिधे परीक्षा हाल में मिलने वाले होते है। शासकीय नियमों में बंधे
होने के कारण हम शिक्षक भी उनका नाम खारिज नही करते। अंत में इन बच्चों का परिणाम
क्या होता होगा आप खुद ही समझ सकते है ।
परीक्षाओँ को हल्के में लेना - यदि मैं ईकाई, त्रैमासिक, अद्धवार्षिक परीक्षा या लोकल
कक्षाओँ की बात करूं तो स्कूलों में इन परीक्षाओँ का ईमानदारी से संचालन नही किया
जाना भी बच्चों के अनुत्तीर्ण होने का बड़ा कारण बनता है। जब स्कूल द्वारा इन परीक्षाओं
को महत्व नही दिया जाता तब बच्चे हल्के में लेने लगते है और इनकी तैयारी उस हिसाब
से करके परीक्षा मे नही बैठते जैसा करना चाहिए। जिससे बच्चे तथा शिक्षक सही आकलन नही कर पाते। कई स्कूलों में तो कापियां भी चेक नही की जाती है बच्चों को अनुमानित नंबर दे दिया जाता है ।जबकि
यह उसी प्रकार महत्वपूर्ण है जैसे हम कोई गीत, संगीत, नृत्य, नाटक में भाग लेने से
पहले बार-बार अभ्यास करते है। और अभ्यास में ही कमी करें तो कीसी भी काम में असफल
होना ही है ।
कापियां न बनाना- बच्चों द्वारा अधिकांशतः कापियां ही नही बनायी जाती है । बच्चों को लगता है कि कापियां या नोट्स बनाने से ज्यादा अच्छा बाजार से गाइड खरिद कर पढ़ना अच्छा है जबकि किसी भी विषय के पाठ के समाप्ति पर खुद अपने हाथ से लिखकर कापियां बनानी चाहिए। जब बच्चे खुद से अपनी नोट्स तैयार कर रहे होते है तब असल उसके पाठ की तैयारी भी हो रही होती है। जब खुद बच्चे अपने लिखे कापी का अध्ययन समयानुसार करते है तब उन्हे ज्यादा फायदा होता है। प्रत्येक बच्चों को अपने लिख खुद कापी बनानी चाहिए साथ ही शिक्षक को भी इस हेतु प्राथमिकता से प्रयास करने की आवश्यकता होती है। पालक को भी चाहिए की समय पर अपने पाल्य को शिक्षण सामग्री खरीद कर उपलब्ध करायें।
कापियां न बनाना- बच्चों द्वारा अधिकांशतः कापियां ही नही बनायी जाती है । बच्चों को लगता है कि कापियां या नोट्स बनाने से ज्यादा अच्छा बाजार से गाइड खरिद कर पढ़ना अच्छा है जबकि किसी भी विषय के पाठ के समाप्ति पर खुद अपने हाथ से लिखकर कापियां बनानी चाहिए। जब बच्चे खुद से अपनी नोट्स तैयार कर रहे होते है तब असल उसके पाठ की तैयारी भी हो रही होती है। जब खुद बच्चे अपने लिखे कापी का अध्ययन समयानुसार करते है तब उन्हे ज्यादा फायदा होता है। प्रत्येक बच्चों को अपने लिख खुद कापी बनानी चाहिए साथ ही शिक्षक को भी इस हेतु प्राथमिकता से प्रयास करने की आवश्यकता होती है। पालक को भी चाहिए की समय पर अपने पाल्य को शिक्षण सामग्री खरीद कर उपलब्ध करायें।
मोबाईल - आज के परिवेश में शायद ही कोई छात्र-छात्रएं मिले जो मोबाईल का उपयोग नही
करते हो। कई छात्र एसे भी मिल जाते है जो कक्षा में पढ़ाई के दौरान पीछे बैठकर
मोबाईल से खेल रहे होते है। बच्चे स्कूल से जाने के बाद घर पर नियमित अध्ययन करने
के बजाए मोबाईल का भरपूर दुरूपयोग करने लगते है। जब असीमित घंटो तक हम मोबाईल का
उपयोग कर रहे होते है तब असल में हमारी सारी ज्ञानेंद्रियां मोबाईल पर केन्द्रित
हो जाती है। एसे में बच्चे पढ़ाई में अपना ध्यान केन्द्रित नही कर पाता। जब हम
मेमोरी कार्ड को मोबाईल में लगाकर गीत, विडियो या फोटो देखते है तब अभी अभी देखी
गयी सामग्री सबसे उपर आ जाती है जबकि पहले से मौजूद ढेरो सामग्री पीछे चली जाती है।
हमारा दिमाग भी मोमोरी कार्ड की तरह है। वही काम हमारे दिमाग में भी होता है
मोबाईल से देखे जाने वाली सामग्री का दिमाग में पहले आने लगती है जबकी याद की हुई
महत्वपूर्ण बातें दिमाग के एक कोने में दूर केन्द्रित होती जाती है या मैं यह कह
सकता हूं की हम याद किए हुए बातें भूलने लगते है। हमारे जीतने भी टापर है सभी ने
एक ही बात कही है कि हमने सोशल मिडिया से दूर रहकर पढ़ाई की है।
विभागीय प्रयोग - हमारे शिक्षा विभाग में आये दिन नये-नये प्रयोग किया जाता
है। कभी-कभी शिक्षा सत्र के बीच में ही प्रायोगिक योजना बनाते है। अधिकारीयों
द्वारा दूरगामी परिणाम को ध्यान में रखकर विभिन्न योजनाओं का क्रियान्वयन किया
जाता है। कई तरह के प्रयोग से शिक्षक का शिक्षकीय कार्य प्रभावित होता है। और इनका
असर बच्चों पर पड़ता है। नये प्रयोग से फायदा ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए पर ऐसा
नही हो पाता। क्या योजनाओं में कमियाँ होती है या क्रियान्वयन में या हम शिक्षकों
द्वारा जमीनी स्तर में योजना पहुंचाने में कमी हो जाती है समझ से परे है। इस तरह के विभन्न नित नये प्रयोग से बच्चे उलझन में आ जाते है कि क्या पढ़े क्या न पढ़े और परिणाम नगण्य आता है ।
अंत में आप सभी सम्मानीय माता-पिता और पालकों से अनुरोध करना चाहता हूँ कि आप अपने बच्चे को आगे बढ़ाने में नियमित रूप से विद्यालय भेजकर, गृहकार्य की जानकारी लेकर था मोबाईल से बच्चे को जितना हो सके दूर रखकर सहयोग करने का कष्ट करें ।
लेखन
सी.पी.ढीढी
व्याख्याता (विज्ञान)



बहुत प्यारी बात सर जी 💐💐💐
जवाब देंहटाएंधन्यवाद, किमती समय निकालकर पढ़ने के लिए।
जवाब देंहटाएंSir notes Ni banana bhi ek reason hai
जवाब देंहटाएंसर जी शिक्षक का राजस्व एवं चिकित्सा विभाग भी तो है ।
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