बेटियाँ इस दुनियाँ की सर्वोत्तम कृति है। आज ये बेटियां नही होती तो इस दुनियां का अस्तित्व भी नही होता। होती भी तो ये धरा बेजान होती। इस बात से इंकार नही किया जा सकता कि इस संसार की रचना में बेटियों का भी बराबर की भागीदारी है। गंभीरता से सोचिए आपको पता चलेगा कि, बेटी ही बड़ी होकर मां बनी और उसी मां से हम उपजे है । यही बेटियां मां, बहु, बहन, पत्नी, दोस्त न जाने कितनों किरदार निभाती रहती है।
पर बेटियों पर अत्याचार की खबरें शायद ही कोई दिन हो जब अखबारों में पढ़ने, सुनने को न मिलते हो। जो भी खबरें मिलती है उसमें कैन्डल मार्च या दोषी के लिए आक्रोश आदि ही परिलक्षित होती है। जितनी भी खबरें होती है घटना के बाद न्याय के लिए शोरगुल ही होता है। कुछ घटनाओं पर तो किसी का ध्यान ही नही जाता। कुछ घटनाएँ शुर्खियां बन जाती है। उस पर भी लंबी जंग के बावजूद न्याय नही मिल पाता है। कुछ में निर्णय आ भी जाता है पर दोषी मुक्त हो जाते है। लाखों में किसी एक दोषी को कठोर दंड मिल पाता है। जिस पर भी वृहत समाज इक्के-दूक्के निर्णय के कारण सबक नही ले पाता। इस तरह की घटनाएँ कम नही होकर और बढ़ती जा रही है। आखिर कब तब बेटियां, महिलाएँ अत्याचार, बालात्कार, आग में जलाने, शारीरिक मानसिक प्रताड़ना जैसी जघन्य घटनओं का हिस्सा बनती रहेगी।
असल समस्या और उस समस्या को जड़ से समाप्त करने की दिशा में कोई सोच ही नही पाता है। वास्तव में हमें कोई स्थायी हल के विषय में विचार करने की आवश्यकता है जिससे बेटियां खुद अपनी रक्षा बेटों की तरह कर सके। घटना घट जाने के बाद कब तक सर पटकते रहेंगे। कब तक अपनी बेटियों की असुरक्षा पर पुलिस, प्रशासन आदि को दोष देते रहेंगे।
आईये याद करते है बचपन से बेटियों की परवरिश के विषय में । मैं दावा कर सकता हूँ प्रत्येक माता-पिता, भाई, पति, दोस्त या अन्य रिस्तेदार कभी न कभी अपनी मां, बहन, बेटी, पत्नी, बहु को यह अहसास अवश्य दिलाये होंगे कि, तुम बेटा जैसे नही हो। तुम यह काम नही कर सकोगी। तुम उस काम के लायक नही हो। बेटों की तरह आगे बढ़ने का पर्याप्त अवसर भी नही देते है। शिक्षा के क्षेत्र में उन्हे उच्च शिक्षा से वंचित रखते है। किसी भी मसले पर उनकी की राय को अहमियत नही दिया जाता है।छोटे भाई को भी बड़ी बहनों को डांट फटकार लगाने का अधिकार देते है पर बड़ी बहन किसी छोटे को गलती पर भी कुछ नही बोल सकती।
संस्कार के नाम पर बेटियों की जन्म से ही निचे झुकाते आये है। हम बेटियों को बेटों से कमतर आंकने में लगे रहते है।
जब हम किसी को बार-बार कमजोर साबित करते जाते है तब वह बेसक ही उसी की तरह मनोदशा बनाने लगते है। जी हां बिल्कुल सही समझे आप हम बचपन से ही बेटियों को ये बार-बार ओर रोज-रोज याद दिलाते रहते है कि तुम कमजोर हो। आप ही बताइए कमजोर मानसिकता से हम बेटियों की परवरिश करेंगें तब उसमें विषम परिस्थिति से लड़ने के गुर कहां से आएँगे। इस तरह बेटिंयां अपने आप को समस्या पर पुरी तरह झोंक देती है। और अपनी आत्मरक्षा के लिए स्वयं लड़ पाने में असमर्थ हो जाती है।
इस समस्या का एक ही हल है बेटियों को मजबूत बनाना होगा। और एसा करने के लिए बेटियों को बेटा कहकर पुकारना होगा। जी हां आप शुरूवात तो करिये उन्हे मानसिक तौर पर मजबूत होने से कोई नही रोक सकता है। तब देखिए कितने दरिंदे अस्मत लुटने की हिम्मत जुटा पाते है। अखबारों में समाचार के रूप बदल जाएँगे।
लेखन
सी.पी.ढीढ़ी
(व्याख्याता) विज्ञान





सराहनीय सर जी🙏🙏
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