गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

विद्यालय में बच्चों के शैक्षणिक विकास के प्रमुख आयाम


किसी भी शासकीय विद्यालय के बारे में सामान्यतयः लोगों के सोचने का नजरिया अलग ही रहता है । जैसे वह अपनी मनोदशा बनाकर ही रखते हो पहले से। अधिकांश लोग शासकीय स्कूलों की ढेरों बुराई गिनाने में लगे रहते है ।यहां तक शिक्षक भी मानने लगता है कि खुद के स्कूल के बच्चे कमजोर है । जहां तक मैं सोचता हूं । हम बच्चों की कमजोरी को जान तो लेते है पर असल कारण को जानना नही चाहते ।किसी भी विद्यालय के बच्चों का मानसिक, शारिरिक व शैक्षणिक विकास के लिए 4 पहलू महत्वपूर्ण है आइए इस पर गौर करने की कोशिक करते है ।
1.पालक-
              किसी भी बच्चे के शैक्षणिक विकास के लिए सबसे अहम भूमिका पालक की होती है । यदि पालक अपने बच्चों के प्रति सजग हो जाए तो मुझे नही लगता की उनको अपने बच्चे में कोई कमजोरी नजर आयेगी ।खासकर हमारे छ.ग.के शासकीय विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों के माता पिता बहुत कम ही मिलते है जो बच्चों से घर पर उनके अध्ययन के बारे में पुछते या चर्चा करते होंगे ।गांंवों में तो स्थिति और ज्यादा बदतर है । इक ही रटा रूटाया जवाब हम लोग तो पढ़े लिखे नही है । मैं एेसे पालक से जानना चाहता हूं कि ,क्या वह अपने बच्चों से केवल यह नही पुछ सकते की आज आपके स्कूल में क्या क्या हुआ । मैं तो कहता हूँ पालक केवल बच्चों को नियमित विद्यालय भेजने की जिम्मेदारी ही पूरी तरह अपने उपर ले ले तो कोई भी बच्चा पढ़ाई में कमजोर नही होंगें ।
2.बालक-
       जो बच्चे स्कूल जाते है । वही खूद अपने मानसिक,शारिरिक व शैक्षणिक स्थिति के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार होते है ।आज का बालक अध्ययन में एकाग्र ही नही हो पाता। शिक्षक द्वारा दिए गये गृह कार्य को पूरी इमानदारी से करने लगे । विद्यालय में करायी जा रही शैक्षणिक गतिविधियों में भरपूर रूप से भाग लेने लगे।तो बच्चों के शैक्षणिक विकास होने से उन्हे कोई रोक ही नही सकता ।
3.शिक्षक-
      बच्चों के शैक्षणिक विकास में शिक्षक की भूमिका अति महत्वपूर्ण होती है । इस बात को नकारा ही नही जा सकता ।शिक्षक पूरी तन्मयता से यदि बच्चों पर ध्यान दे। सभी बच्चों को गतिविधियों में भाग लेने का भरसक प्रयास करें । विशेषकर कमजोर लग रहे बच्चे को सिखने का ज्यादा से ज्यादा अवसर उपलब्ध करये ।तथा बच्चों से मित्रता पूर्वक व्यवहार करने लगे । पालकों से भी समय समय पर मिलने का प्रयास करें । एसे में बच्चे का पूरा ध्यान अध्ययन में लगने लगेगा ।
4.परिवेश-
       विद्यालय का परिवेश शिक्षण के अनुरूप नही हो तो बच्चों को विद्यालय आने में उत्साह की कमी होने लगती है । विद्यालय में पर्याप्त रंगरोगन,चित्र ,चार्ट हो सके तो छोटा सा प्रयोग शाला कोई भी स्तर के विद्यालय हो आवश्यक है ।हो सके तो बच्चों को ही परिवेश में सुधार की सलाह लें और उन्हे विद्यालय के परिवेश को सजाने का अवसर दें।
      लेखन
सी.पी.ढीढी
व्याख्याता(विज्ञान)

3 टिप्पणियाँ:

  1. शिक्षा के प्रति आपकी यह गहन रूचि सराहनीय है ! मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि एक शिक्षक इतनी निष्ठा से अपना दायित्व निर्वहन कर रहा है !
    सुरेश कुमार सोनी
    कार्यपालन यंत्री
    सीएसपीजीसीएल कोरबा पश्चिम
    मो. 9407954361

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  2. धन्यवाद श्रीमान जी । अपने कर्तव्य का निर्वाह करने की कोशिश कर रहा हूँ।

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